पुकारे हिंदुस्तान

आशीष बहल

रचनाकार- आशीष बहल

विधा- कविता

बढ़ बढ़ तू, चल चल तू देश की ये पुकार है, 
निर्लज नहीं तू निर्बल नहीं तू, वीरों की संतान है!
सिहं सी दहाड़ तुझमे हिम सा तू पहाड़ है,
बढ़ बढ़ तू ,चल चल तू मुश्किल में हिंदुस्तान है,
कह रहा है वतन तुझसे उठ अब खतरे में मेरी आन है, कह दे तू दिल तो क्या जान भी ऐ वतन तुझपे अब कुर्बान है, 
पस्त  है लोकतंत्र देख कर भी तू क्यों मस्त है,लुट रहा है देश अब तो फिर भी क्यों खड़ा तू लाचार है
बढ़ बढ़ तू ,चल चल तू लुट रही देश की शान है,
जाग कर देख तू माँ भारती का दामन दागदार है, दुश्मन का नहीं अपनों का ही ये प्रहार है, 
कर वार तू दुश्मन  पर  याद रख मिटाना ये भ्रष्टाचार है,बढ़ बढ़ तू ,चल चल तू देश  की ये पुकार है!

देश की खातिर शीश कटाए, गोदें भी उजड़ी थी,तोड़ गुलामी की बेड़ियाँ भारत ने ली नई अंगड़ाई थी, 
पर भूल गये की आगे और भी लड़ाई थी,
खोले जो न अब खून तेरा बेकार तेरी ये जवानी है!
कह रहा  " आशीष " तुमसे 
उठ जाग अब लिखनी तुझे अपने खून से नयी कहानी है, चीख रही माँ भारती की आबरू अब हमें बचानी है,बढ़ बढ़ तू चल चल तू  की  देश की ये पुकार है, खतरे में माँ भारती की आन है।

आशीष बहल चुवाड़ी जिला चम्बा

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आशीष बहल
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अध्यापक, कवि, लेखक व विभिन्न समाचार पत्रों में स्तम्भ लेखन

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