पिय नहि समझे

dr. pratibha prakash

रचनाकार- dr. pratibha prakash

विधा- कविता

पीर जिया की पिय नहीं समझे
जग को दिखान से का होय जाहि
आँख न समझे आँख की व्याधा
नीर बहाये से का होय जाहि
नदिया बन गई नैनन कोरें
मिलन ज्वार हिय में उठि आयि
सावन बन के बदरा वरषे
प्यास जिया की बुझ नहि पायि
मेघा रो रो विरह सुनावे
ले ले नाम बस तोहे बुलायि

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dr. pratibha prakash
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Dr.pratibha d/ sri vedprakash D.o.b.8june 1977,aliganj,etah,u.p. M.A.geo.Socio. Ph.d. geography.पिता से काव्य रूचि विरासत में प्राप्त हुई ,बाद में हिन्दी प्रेम संस्कृति से लगाव समाजिक विकृतियों आधुनिक अंधानुकरण ने साहित्य की और प्रेरित किया ।उस सर्वोच्च शक्ति जसे ईश्वर अल्लाह वाहेगुरु गॉड कहा गया है की कृपा से आध्यात्मिक शिक्षा के प्रशिक्षण केंद्र में प्राप्त ज्ञान सत्य और स्वयं को आपके समक्ष प्रस्तुत कर रही हूँ।

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4 comments
  1. बहुत खूब , शब्दों की जीवंत भावनाएं… सुन्दर चित्रांकन