पिता

त्रिलोक सिंह ठकुरेला

रचनाकार- त्रिलोक सिंह ठकुरेला

विधा- गीत

पिता ! आप विस्तृत नभ जैसे,
मैं निःशब्द भला क्या बोलूं.
देख मेरे जीवन में आतप,
बने सघन मेघों की छाया.
ढाढस के फूलों से जब तब,
मेरे मन का बाग़ सजाया.
यही चाहते रहे उम्र भर
मैं सुख के सपनो में डोलूं.
कभी सख्त चट्टान सरीखे,
कभी प्रेम की प्यारी मूरत।
कल्पवृक्ष मेरे जीवन के !
पूरी की हर एक जरूरत।
देते रहे अपरिमित मुझको,
सरल नहीं मैं उऋण हो लूँ।
स्मृतियों की पावन भू पर,
पिता, आपका अभिनन्दन है।
शत-शत नमन, वंदना शत-शत,
श्रद्धा से नत यह जीवन है।
यादों की मिश्री ले बैठा,
मैं मन में जीवन भर घोलूँ।
— त्रिलोक सिंह ठकुरेला

Views 51
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
त्रिलोक सिंह ठकुरेला
Posts 10
Total Views 328
त्रिलोक सिंह ठकुरेला कुण्डलिया छंद के सुपरिचित हस्ताक्षर हैं.कुण्डलिया छंद को नये आयाम देने में इनका अप्रतिम योगदान है.

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia
3 comments