पावस की महिमा

Manjusha Srivastava

रचनाकार- Manjusha Srivastava

विधा- कविता

तपन भरे इस जग को आकर घेरा जब काले मेघों ने |
पावस का स्वागत करने को उल्लास अनोखा फूट पड़ा |

चमकी दामिनि की एक लहर एक ज्योति पुंज सा फैल गया |
अपनी बहुरंगी आभा से वर्षा ऋतु ने श्रंगार किया |

पावस की पहली बारिश जल भर के ज्यों – ज्यों बरसी |
वह पहली बौछार धरा ने सारी की सारी सोखी |

सौंधी सौंधी गंध मटीली धरा रोम से फूट पड़ी |
मादक सी एक गंध उठी जो पुरवाई से फैल गयी |

वर्षा ऋतु का आकर्षण मन को आकर्शित करता है |
बारिश में जी भर भीगूँ मैं मन में भाव उमड़ता है |

टप – टप माथे पर बूँद पड़ी मेघों ने नम कर दिया मुझे |
मेरा भी तन -मन पुलकित हो वन मोरों सा झूमे नाचे |

हरियाली से पूर्ण धरा नव वधू सरीखी सज जाती |
हर्शित होता मेरा भी मन मैं भी दुल्हन सी सज जाती |

ताल तलइया भर जाते नाले भी सब नदियाँ लगते |
कागज की कश्तियाँ लिये नन्हें मुन्ने मिल तैराते |

सुखद सलोना सा बचपन वर्षा तुम याद दिलाती जब |
मैं बचपन में खो जाती कागज की नाव बनाती तब |

पल पल रूप बदलती धरती पावस की महिमा ऐसी |
बादल की कजरीली छइयाँ कहीं सुनहरी
धूप खिली |
©® मंजूषा श्रीवास्तव

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