पापा

Dr Archana Gupta

रचनाकार- Dr Archana Gupta

विधा- गज़ल/गीतिका

पापा को समर्पित एक ग़ज़ल
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तुम्हें ही ढूँढती रहती तुम्हारी लाडली पापा
तुम्हारे बिन हुई सूनी बहुत ये ज़िन्दगी पापा

अँधेरी रात हो कितनी उजाले ही भरे तुमने
बिछाकर नेह की अपनी हमेशा चाँदनी पापा

सिखाया था जहाँ चलना पकड़कर उँगलियाँ मेरी
गुजरती हूँ वहाँ से जब रुलाती वो गली पापा

मिले चाहें यहाँ कितने मुझे अनमोल से रिश्ते
मिला लेकिन जमाने में नहीं तुम सा कोई पापा

ख़ुशी चाहें मिले मुझको या गम की बात हो कोई
मुझे महसूस होती है तुम्हारी ही कमी पापा

मनाना 'अर्चना' उनका बहुत अब याद आता है
लड़ाते लाड़ थे कहकर कहाँ मेरी परी पापा

डॉ अर्चना गुप्ता

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Dr Archana Gupta
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Co-Founder and President, Sahityapedia.com जन्मतिथि- 15 जून शिक्षा- एम एस सी (भौतिक शास्त्र), एम एड (गोल्ड मेडलिस्ट), पी एचडी संप्रति- प्रकाशित कृतियाँ- साझा संकलन गीतिकालोक, अधूरा मुक्तक(काव्य संकलन), विहग प्रीति के (साझा मुक्तक संग्रह), काव्योदय (ग़ज़ल संग्रह)प्रथम एवं द्वितीय प्रमुख पत्र पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित।

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14 comments
  1. मार्मिक रचना …. बधाई सम्मानित अर्चना जी