पापा कहते हैंं…

पं.संजीव शुक्ल

रचनाकार- पं.संजीव शुक्ल "सचिन"

विधा- लेख

पापा कहते हैं , आज के बच्चों की यह सबसे बड़ी ब्यथा है पापा कहते हैं काबिल बनो , पापा कहते हैं सफलता के झंडे गाड़ो, जो मैं न कर सका वो तुम करो लोग हमारे नाम से नहीं तुम्हारे नाम से हमें पहचाने ।
लगभग हर एक पिता की यहीं जिज्ञासा है, अपने बच्चों से यहीं इच्छा है ।
यहीं कारण है कि पापा कहते हैं बस कहते ही रहते है।
माना युग बदल रहा है , परिवेश बदल रहा है, सभ्यता,संस्कार, संस्कृति अपने विलुप्त होने के कागार पर आ खड़ी हुई है
किन्तु एक पिता के मन की दशा बदली है क्या?
बच्चों के उज्जवल भविष्य के प्रति उसकी चिन्ता कम हुई है क्या?
बच्चों से ऐसी प्रत्याशा रखना क्या जायज नहीं है?
मैं भी एक पिता हूँ, अपने बच्चों को एक साफ सुथरा, सरल व सुन्दर जीवन दे सकूँ इसके लिए निरंतर सोलह घंटे थकावट होते हुये भी बीना थके काम करता हूँ, इस समाज के हर क्षेत्र में स्थापित ठेकेदारी प्रथा से प्रति दिन लड़ता हूँ।
साहब इन ठेकेदारों से होने वाली द्वन्द में आत्मा लहुलुहान हो जाती है, हृदय दर्द का आलय बन जाता है किन्तु हम कदापि इसका भान अपने नवनिहालों को होने नहीं देते।
आप हीं बतायें होने देते हैं क्या? नहीं न!
अब आप ही बतवे साहब इतने दारुण दुख का वरण करने के पश्चात पापा कहते हैं तो क्या गलत कहते है?
अपने बच्चों से कोई आशा रखते है तो क्या यह अनुचित करते है?
और हाँ अगर पापा का कहना, आशा रखना मिथ्या है तो फिर ये बच्चे ही बताये अपने शब्दों में समझायें पापा करें तो क्या करें।
अपने बच्चों को एक आधार पूर्ण जीवन देने के चक्कर में हमारे बच्चे कब बड़े हो गये ये पता ही नहीं चलता और जब पता चलता है तो आपके और हमारे समक्ष यहीं अनंत प्रश्न होता है…..
पापा आखिर क्यों कहते हैं ।
पापा के मनोदशा को कौन समझे?
पापा के उन प्रयासों का आखिर पुरस्कार क्या है
सही मायने में अर्थ क्या है क्या हमे भी कोई बतायेगा
इन निर्जीव हो चले प्रश्नों का कोई उत्तर देगा??????
क्या हमें अधिकार नहीं है कि हम भी एक उच्चकोटि की जीवनशैली अपनाये और उसी के हो जाये।
अपने इच्छाओं को पुरा करे , परिस्थितियों से कोई समझौता न करें ।
हम भावी पीढी के समबद्ध क्यों सोचें?
किन्तु ऐसा हो सकता है क्या?
नहीं न; यह कभी नहीं हो सकता कारण यह प्रकृति विरुद्ध है , कल हमारे पापा ने हमें कहा , हमारे लिए खुद को अपने तमाम जीवन को हमरी भलाई पर न्योछावर कर दिया आज वहीं हमें करना है जो हम कर रहे हैं , और यहीं विरासत कल इन्हे भी मिलने वाली है।
अगर ये आज न सम्हले फिर कल क्या होगा?
हैं अनंत का तत्व प्रश्न यह
फिर क्या होगा उसके बाद?
पं.संजीव शुक्ल "सचिन"
नरकटियागंज
प.चम्पारण
बिहार
9560335952
20/5/2017

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पं.संजीव शुक्ल
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मैं पश्चिमी चम्पारण से हूँ, ग्राम+पो.-मुसहरवा (बिहार) वर्तमान समय में दिल्ली में एक प्राईवेट सेक्टर में कार्यरत हूँ। लेखन कला मेरा जूनून है।

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