“पाने की तलब है”

Surya Karan

रचनाकार- Surya Karan

विधा- गज़ल/गीतिका

पाने की तलब है, न मुकद्दर में यकीं है
मेरे कदम वहीं है ,जहाँ मेरी जमीं है।

आँखों मे तिरे आज भी हया की नमीं है
लगता है मुझे मेरी ही वफ़ा मे कमी है ।

तु पहले तो हसीं थी, मग़र अबके नशी है
जुल्फों की ओंट में तेरी चंदा सी हँसी है।

साहिल आँखों में भोली सी सूरत बसी है
बस इसलिए ही;हमें तो ये दुनिया जंची है।

S.K. soni अग्निवृष्टि🌞

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Surya Karan
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Govt.Teacher, M.A. B.ed (eng.) Writer.

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