पानी का बुलबुला

NIRA Rani

रचनाकार- NIRA Rani

विधा- कविता

पानी का बुलबुला ….

सुबह सुबह मिट्टी मे कुछ पंखुडी देख
कदम ठिठक गए

कौतूहल वश ……….
फूल की दशा देख मन बहक गया

गौर से देखा तो गुलाब की पंखुडी थी

याद आया अभी कल ही तो पौधे मे सजी थी

उसकी खूबसूरती सबको बहका रही थी

हर आने जाने वालो को ठगा रही थी

अपने यौवन पे चहक रही थी

पौधे की डाली पर गुमान से लहक रही थी

पर आज मलिन सी मिटटी मे पडी थी
न संगी न साथी अकेले ही पडी थी

मन चित्कार उठा ………….

सचमुच इंसान हो या पुष्प

सबकी यही नियति थी …

फिर क्यू राग ..द्वेष …और गुमान की द्रष्टी है

मिट्टी से उठा है मिट्टी मे मिल जाएगा

. पानी का बुलबुला है पल मे ढल जाएगा …

न कद्र स्वंय की करी है न ही करी थी

सचमुच गुलाब की पंखुडी मिट्टी मे मिली थी

न संगी न साथी अकेले ही पडी थी !
नीरा रानी ….

Sponsored
Views 39
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
NIRA Rani
Posts 63
Total Views 2.8k
साधारण सी ग्रहणी हूं ..इलाहाबाद युनिवर्सिटी से अंग्रेजी मे स्नातक हूं .बस भावनाओ मे भीगे लभ्जो को अल्फाज देने की कोशिश करती हूं ...साहित्यिक परिचय बस इतना की हिन्दी पसंद है..हिन्दी कविता एवं लेख लिखने का प्रयास करती हूं..

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia