पसीने से ख़ुद को तो भिगाया करो

अजय कुमार मिश्र

रचनाकार- अजय कुमार मिश्र

विधा- गज़ल/गीतिका

ग़म की हो या हो ख़ुशी का ही पल
दोस्तों को तुम मत भूल जाया करो/

रिश्तों में कुछ नयापन सा आ जाएगा
संग उनके तो महफ़िल सजाया करो/

मिल जाएँगी ख़ुशियाँ तो बे-इंतहा
रोतों को ही अगर तुम हँसाया करो/

दौड़ते को तो गिराते ही सब हैं यहाँ
गिरते को अब तुम तो उठाया करो/

राह कठिन हो,मिलेगी मंज़िल मगर
पसीने से ख़ुद को तो भिगाया करो/

दायित्वों का गर बोझ बढ़ ही गया
बारिश में तब खुलकर नहाया करो/

लौट बचपन में थोड़ा तुम तो चलो
काग़ज़ की नाँव कभी बहाया करो/

जो तुम्हारी फ़िकर करते रहते सदा
उनको तो तुम मत भूल जाया करो/

पा जाओ ही जब उन्नति का शिखर
मग़रूर कभी भी मत हो जाया करो/

बुज़ुर्गों की नेकी से ही फलते हैं हम
उनसे तो अदब से पेश आया करो/

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अजय कुमार मिश्र
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रचना क्षेत्र में मेरा पदार्पण अपनी सृजनात्मक क्षमताओं को निखारने के उद्देश्य से हुआ। लेकिन एक लेखक का जुड़ाव जब तक पाठकों से नहीं होगा , तब तक रचना अर्थवान नहीं हो सकती।यहीं से मेरा रचना क्रम स्वयं से संवाद से परिवर्तित होकर सामाजिक संवाद का रूप धारण कर लिया है। कविता , शेर , ग़ज़ल , कहानियाँ , लेख लिखता रहा हूँ।

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