पलाश का साधुत्व

shuchi bhavi

रचनाकार- shuchi bhavi

विधा- कव्वाली

ऐ पलाश! मैंने देखा है तुम्हें फूलते हुए,
देखा है मैंने-
तुम्हारी कोंप-कोंप से प्रस्फुटित होते-
यौवन को..
मैंने देखा है,
तुम्हें वर्ष भर फाल्गुन की बाँट जोहते…

पर,नहीं देखा मैंने-
बचपन आज के बच्चों में,
यौवन आज के युवाओं में,
और मैंने नहीं देखी-
गरिमामयी वृद्धावस्था…

हाँ,मैंने जरूर देखा-
असमय युवा होते बचपन को,
युवावस्था में वृद्ध होते यौवन को
और वृद्धावस्था में युवा दिखने की
चेष्टा करते प्रौढ़ को…….

और मैंने देखा है-
हर पल,हर कदम,हर क्षण,
मरते आदमी को,,,,

यदि नहीं देखा ,
तो बस ..
तुम्हारे जैसा साधू-ऐ पलाश!
जो साल भर ,,
करता हो फाल्गुन का इंतज़ार..
और आते ही यौवन,,
धारण कर लेता हो-
जोगिया चोला-
हर शाख …हर प्रस्फुटन…..

शुचि(भवि)

Sponsored
Views 22
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
shuchi bhavi
Posts 14
Total Views 192
Physics intellect,interested in reading and writing poems,strong belief in God's justice,love for humanity.

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia
4 comments