परदेशी पुत्र

राहुल कु

रचनाकार- राहुल कु "विद्यार्थी"

विधा- कहानी

आज वर्षों बाद रामु अपने गाँव वापस आ रहा था |
ज्योँहि वो रिक्सा से उतरा गाँव के बूढ़े,बच्चे,औरतें सभी की नजरें उन पर ही टिकने लगी | रामु की माँ की भी नजर जैसे ही वर्षों बाद शहर से लौट रहे अपने बेटे पर पड़ी उनकी आँखों से खुशी के आँसू छलक पड़े | लेकिन उसके साथ शहरी वेश-भूषा से सज्जित एक 20-21 वर्ष की खूबसूरत युवती और लगभग एक साल के मासुम बच्चे को देख वो थोड़ा असमंजस में पड़ गई. लेकिन जानने के बाद पता चला कि वो उनकी बहू और पोते हैं.बिना किसी जानकारी के हुई शादी से वो थोड़ी विचलित तो जरूर हुई लेकिन अपने बेटे की खुशी में ही अपनी खुशी मान प्रसन्न भी हो गई.अब पहली बार घर आई बहू का ठीक उसी प्रकार सत्कार किया गया जिस प्रकार एक नई-नवेली दुल्हन का पहली बार ससुराल आने
के वक्त किया जाता है. आरती के साथ-साथ मंगलगान गाया गया.फिर सभी को वही मिट्टी की दिवार और फूस के छत वाले घर में प्रवेश कराया गया.अब रामु की विधवा माँ अपने इकलौते बेटे,बहू और पोते से बेहद खुश थी.उसे लगा वर्षों का सपना आज पूरा हो गया.लेकिन यह सपना उसका एक बार फिर टूट गया जब उन्हें पता चला कि उनका बेटा मात्र दस दिनों की छुट्टी में अपने कुल देवता का आशिर्वाद लेने आया है.अब माँ अपने खुशी के बचे वो चार पल गिनने में लग गई.इधर घर में शहरी व्यवस्था न होने के कारण रोज बहू का अपने से पति से कहा-सूनी होने लगी थी साथ ही साथ वो सास को भी डाँट-फटकार लगाने लगी थी.फिर भी अपने बेटे,बहू और पोते को कुछ दिनों का मेहमान समझ उन सभी पर वो अपना स्नेह और माँ की ममता लुटाती रही.आज दस दिन पूरा होने को है.सामान भी समेट लिया गया है.बस रिक्से के आने का इंतजार है.अब बुढ़िया को जो गम बेटे के न आने से था,उससे भी ज्यादा आज बेटे,बहू और पोते के बिछड़ जाने से हो रहा था.बस खुद में संतोष बांधे मन ही मन कह रहा थी- "अब वो मर भी जाये तो कोई बात नहीं.अपने बहू बेटे और पोते को देख उनकी आत्मा तृप्त हो गई."
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~~~~~~~ राहुल कु "विद्यार्थी"~~~~~~~~
17/08/2017

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राहुल कु
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राहुल कु विद्यार्थी मुंगेर (बिहार) 7739000555 विशेष विधा:- प्रेम मनुहार

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