पढ़ना लिखना छोड़ दिया मैंने

विवेक दुबे

रचनाकार- विवेक दुबे

विधा- कव्वाली

–पढ़ना लिखना छोड़ा मैंने—
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हाँ पढ़ना लिखना छोड़ दिया मैंने
पढ़ें लिखों को पीछे छोड़ दिया मैंने
बहुत कुछ सीख लिया मैंने
बहुत पढ़ा था मेरा भाई,
बहना ने भी की खूब पढ़ाई ।
बाबा ने लगा दाव सारी पूंजी लुटाई
धूल खा रही डिग्रियां सारी,
न पाया कोई पद सरकारी ।
मजदूरी करे कैसे,
डिग्रियां आड़े आये रोड़े जेसे ।
बहना भी भटकी इधर उधर ,
नही मिला कोई पद पर ।
बेटी की उम्र हो रही ,
माँ बीमार पड़ी सोच सोच कर ।
सो बिन सोचे समझे ब्याह रचाया,
बहना के चौका चूल्हा हिस्से आया ।
तब ठाना मैंने मुझे कुछ कर जाना है अपना घर परिवार बचाना है ।
सीख लिए तब मैंने दाव राजनीति के ।
एक झटके में पढ़े लिखों को पीछे छोड़ा ।
बाबा भाई बहन को भर भर थैला देता हूँ।
बच्चों को भी पाठ राजनीति का ही देता हूँ ।
…. विवेक दुबे ©…
रायसेन म.प्

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मैं विवेक दुबे निवासी-रायसेन (म.प्र.) पेशा - दवा व्यवसाय निर्दलीय प्रकाशन द्वारा बर्ष 2012 में "युवा सृजन धर्मिता अलंकरण" से सम्मान का गौरब पाया कवि पिता श्री बद्री प्रसाद दुबे "नेहदूत" से प्रेरणा पा कर कलम थामी काम के संग फुरसत के पल कलम का हथियार ब्लॉग भी लिखता हूँ "कुछ शब्द मेरे " नाम से vivekdubyji.blogspot.com

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