न हो सकी

मधुसूदन गौतम

रचनाकार- मधुसूदन गौतम

विधा- गज़ल/गीतिका

बेबहर गजल
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भले ही हमसे खिदमत नवाजिश न हो सकी।
पर कभी किसी खातिर साजिश न हो सकी। 0

नजर न आई दुनियां को हमारी शक्सियत।
महज इसलिए कि हमसे नुमाइश न हो सकी।1
*
लुट रही थी ढेर खुशियाँ मुफ्त बाज़ार में,
मिलती कैसे हमसे फरमाइश न हो सकी।2

कौन गया खाली तेरे दर से हे राधे ।
क्या हुआ ?पूरी हमारी ख्वाहिश न हो सकी।3

लड़ कर आपस में लुटाते रहे अमनो चैन।
फरिश्तो से भी सुलह समझाइश न हो सकी।4

खानदानी जमीं पर बनता था हक मेरा ।
पर तस्दीक हमारी पैदाइश न हो सकी।5

जोर लगाते रहे हम बाजुओ से जान से।
राजनीतीक जोर आजमाइश न हो सकी।6

महफिल आमादा थी पुरजोर सुनने को ।
किसी तीमारदार से गुज़ारिश न हो सकी।7

दफन तो कर ही देती ' मधु' दुनियां कभी की।
बस दो गज जमीन की पैमाइश न हो सकी।8

****** मधु गौतम

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मै कविता गीत कहानी मुक्तक आदि लिखता हूँ। पर मुझे सेटल्ड नियमो से अलग हटकर जाने की आदत है। वर्तमान में राजस्थान सरकार के आधीन संचालित विद्यालय में व्याख्याता पद पर कार्यरत हूँ।

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