नीति के दोहे

Ankita Kulshreshtha

रचनाकार- Ankita Kulshreshtha

विधा- दोहे

१.
नमन करूँ माँ शारदे .. करुं विनय कर जोर।
विद्या का वरदान दो..करो ज्ञान की भोर ।।
२.
यह नर तन तुझको मिला,रख ले इसका मोल..

जब तक जीवन पास है,मधु सा मीठा बोल॥

३.
आत्मा रूपी नार का,ऐसा कर श्रृंगार

कट जाएं सब बंध भी,भव से हो तू पार…

४.
देह सजी श्रृंगार से ,मन के भीतर मैल

राम नाम के लेप से ,बनते बिगङ़े खेल…

५.
******
बैदेही को आग मेँ,पड़ी तपानी देह ।
तप के बिन ईश्वर नहीं,करे देह से नेह ।।

Ankita

Views 61
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
Ankita Kulshreshtha
Posts 36
Total Views 2.6k
शिक्षा- परास्नातक ( जैव प्रौद्योगिकी ) बी टी सी, निवास स्थान- आगरा, उत्तरप्रदेश, लेखन विधा- कहानी लघुकथा गज़ल गीत गीतिका कविता मुक्तक छंद (दोहा, सोरठ, कुण्डलिया इत्यादि ) हाइकु सदोका वर्ण पिरामिड इत्यादि|

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia
5 comments
  1. वाह !वाह ! बहुत सुंदर दोहे रचे हैं. बहुत बधाई स्वीकारें. फिरभी मैल/खेल देख लें.

  2. वाह वाह बहुत सुंदर और भावपूर्ण दोहे आदरणीया।
    बधाई स्वीकार करें। आद0 अशोक रक्ताले जी से सहमत हूँ।