नीड़ का मोह

सोनू हंस

रचनाकार- सोनू हंस

विधा- लघु कथा

एक पंछी को अपने कुछ कार्यों की निष्पत्ति के लिए किसी आश्रय की आवश्यकता थी। अचानक एक घने वृक्ष पर उसे एक नीड़ दिखाई दिया। उसने उसे अपना आश्रय बना लिया। उसने पाया की नीड़ काफी आरामदायक था। उसने उसे और सुसज्जित करने का इरादा कर लिया। वह प्रतिदिन दूर तक जाता और नीड़ में अपनी सुख सुविधा के सामान इकट्ठा करता।
दूर के वनों में जाकर चंदन की लकडि़यों के तिनकों से अपने नीड़ को सजाता, जिससे उसके नीड़ में सुगंध छाई रहे।
तरह-तरह के फूलों से उसने अपने नीड़ को सजाना शुरू कर दिया।
ऐसा करने में उसका सारा दिन अपने लिए भोजन एकत्रित करने तथा अपने नीड़ को सजाने में ही निकल जाता था।
काफी दिन व्यतीत हो गए। उसकी दिनचर्या वही बनी रही।
एक दिन अचानक एक जोरों का तूफान आया। उस तूफान ने पंछी के घोसले(नीड़) को जमी पर पटक दिया। नीड़ पूरी तरह से नष्ट हो गया था। पंछी नीड़ से बाहर आ गया और प्रलाप करने लगा। उसे रह-रह कर अपने नीड़ की याद आ रही थी।
अचानक उसे याद आया। ओह जिस कार्य के लिए उसने नीड़ का आश्रय लिया था, वह कार्य तो वह कर ही नहीं पाया। उसने अपना सारा समय तो इस नीड़ को सजाने-सँवारने में ही व्यर्थ कर दिया।
जितनी तन्मयता से उसने इस नीड़ को सजाया इतनी तन्मयता से अगर वह अपना कार्य करता तो संभवतः वह उसमें सफल हो सकता था।
परंतु अब कुछ नहीं हो सकता था। कार्य की निष्पत्ति का समय निकल चुका था। व अपना सारा समय नीड़ को सजाने में ही व्यर्थ कर चुका था।
निराश भाव से मन पर एक बोझ लेकर पंछी उड़ गया।
उसका तन्मयता से सजाया गया नीड़ नष्ट अवस्था में वहीं पडा़ रह गया।

अगर समझ में आ जाए तो समय से पहले सावधान हो जाना मित्रों! कहीं सारा समय नीड़ सजाने में ही न चला जाए।
सोनू हंस

ये हमारा शरीर एक घोंसला ही तो है, जिसमें पंछी रूपी हमारी आत्मा या रूह अपने मूल कर्तव्यों को भूलकर इस शरीर को सजाने सँवारने में लग जाती है और कर्तव्यविमुख हो जाती है।
बाद में जब अंत समय आता है और मौत रूपी तूफान के झटके में यह शरीर रूपी नीड़ नष्ट हो जाता है तब जीवात्मा को अहसास होता है कि उसने अपना जन्म व्यर्थ गवाँ दिया। ये शरीर ही तो माध्यम था जिसके जरिए मैं अपने कर्तव्यों की पूर्ति करता। अपने परमात्मा को पा सकता था। मोक्ष को पा सकता था। लेकिन मैंने सारी उम्र इस शरीर को सजाने सँवारने और इच्छा पूर्ति में व्यतीत कर दी।
लेकिन शरीर रूपी घोंसला अब नष्ट हो गया। अब पछताने से क्या होगा। अत: आत्मा रूपी पंछी निराश होकर फिर जन्म मरण के बंधन की यात्रा में फंस जाता है।

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