निशाँ ढूंढते हैं…..

CM Sharma

रचनाकार- CM Sharma

विधा- गज़ल/गीतिका

लोग मेरी ज़िन्दगी का निगेहबाँ ढूंढते हैं…
अफसानों में मेरे इश्क़ का जहॉं ढूंढते हैं…

दो पहर रात बाकी है सूली को अभी से….
गिरह लगाने को गर्दन पे निशाँ ढूंढते हैं….

मोहब्बत उसकी से ख़ौफ़ज़दा है सब इतने…
हर अफ़साने में उसीकी ही दास्ताँ ढूंढते हैं….

न सोचा सलीब पे लटकाने से पहले जिसको…
रहनुमाई को अब हर गली मकाँ ढूंढते है…

तिनका-२ तक फूंक डाला आशियाँ मेरे का…
राख के ढेर में अब 'चन्दर' के निशाँ ढूंढते हैं…..
\
/सी. एम्. शर्मा

Views 7
Sponsored
Author
CM Sharma
Posts 17
Total Views 2k
उठे जो भाव अंतस में समझने की कोशिश करता हूँ... लिखता हूँ कही मन की पर औरों की भी सुनता हूँ.....
इस पेज का लिंक-

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


Sponsored
Related Posts
हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia