** ना देख मन के भेद **

भूरचन्द जयपाल

रचनाकार- भूरचन्द जयपाल

विधा- कविता

ना देख मन के भेद
ना मन में कोई खेद
💐💐💐💐💐
रंग मिलते हैं होली में
मन मिलते हैं होली में
मन खिलते हैं होली में
तन खिलते हैं होली में
💐💐💐💐💐
उमंग मन की देख
तरंग तन की देख
💐💐💐💐💐
रंग खिलते हैं होली में
तन खिलते हैं होली में
भड़ास मन की रेख
सड़ास तन की देख
होली के इस रंग में
बोली के इस ढंग में
💐💐💐💐💐
तन गीला हो जाता है
मन गीला हो जाता है
💐 💐 💐
ना शिकवा
ना शिकायत
मन जिसका
हो जाता है
💐💐💐
खट्टेमीठे सुस्वादु
💐💐
मन व्यंजन
खा पाता है
दिल किसका
हो जाता है
कब किसको
पा जाता है
सब कहते है
होली है
कब कोई
किसकी
होली
ये होली है
जी होली
प्यार की मीठी बोली
फिर बोलो जी होली ।।
👌मधुप बैरागी

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भूरचन्द जयपाल
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मैं भूरचन्द जयपाल वर्तमान पद - प्रधानाचार्य राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, कानासर जिला -बीकानेर (राजस्थान) अपने उपनाम - मधुप बैरागी के नाम से विभिन्न विधाओं में स्वरुचि अनुसार लेखन करता हूं, जैसे - गीत,कविता ,ग़ज़ल,मुक्तक ,भजन,आलेख,स्वच्छन्द या छंदमुक्त रचना आदि में विशेष रूचि, हिंदी, राजस्थानी एवं उर्दू मिश्रित हिन्दी तथा अन्य भाषा के शब्द संयोग से सृजित हिन्दी रचनाये 9928752150

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