* नारी को भी अब जीना आ गया *

Neelam Ji

रचनाकार- Neelam Ji

विधा- कविता

देखा नहीं था बुरी नजर से ,
जिसने दुश्मन को भी कभी ।
आज उसे अपने भले बुरे की ,
पहचान करना आ गया ।
जो ममता की मूरत थी कभी ,
आज उसे दंड देना आ गया ।
टूट कर बिखर जाती थी जो ,
बिखर कर सम्भलना आ गया ।
जिसका जी चाहे गिरा देता था ,
आज हर हाल में चलना आ गया ।
अब ना हक छिन पाएगा कोई ,
हक उसको भी लेना आ गया ।
जिसको हमेशा कमतर समझा ,
उसे भी डटकर लड़ना आ गया ।
दबाकर चुप कराने वालो ,
आज उसे जवाब देना आ गया ।
हंसकर सह लेती थी हर पीड़ा ,
उसको आवाज उठाना आ गया ।
हर जीव को मान देने वाली को ,
अपना मान कराना आ गया ।
संकीर्ण पुराणी रूढ़ियों को ,
बदलते दौर में बदलना आ गया ।
थी घुट-घुट कर जीने को मजबूर ,
मजबूरियों से लड़कर जीना आ गया ।
जिसकी जुबाँ से बस हाँ सुनता था ,
आज उसे ना कहना आ गया ।
जीतकर दिखाएगी हर हाल में ,
खुद को साबित करना आ गया ।
अर्धांगिनी बनकर नर की ,
नर के बराबर खड़े होना आ गया ।

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Neelam Ji
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मकसद है मेरा कुछ कर गुजर जाना । मंजिल मिलेगी कब ये मैंने नहीं जाना ।। तब तक अपने ना सही ... । दुनिया के ही कुछ काम आना ।।

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