नवगीत।रातों मन के अंधेरों मे तस्वीरें चलती रहती है ।

रकमिश सुल्तानपुरी

रचनाकार- रकमिश सुल्तानपुरी

विधा- गीत

नवगीत
रातों मन के
अंधेरों मे
तस्वीरें चलती रहती है ,,-2

शामों से ख़ामोशी ठहरी रहती है मेरे घर ।
फ़ैली रहती है रातों भर तन्हाई की चादर ।
सुबह सबेरे
मन को घेरे
परछायीं बढ़ती रहती है ।
रातों मन के अंधेरों में,,,,,,,,,,

सन्देहों की जाल बिछाती जाती याद सलोनी ।
सोने देती मुझको कैसे स्वप्नों की अनहोनी ।

चक्षु झीलों से
निकल निकल
दुख सरिता बहती रहती है ।
रातों मन के अंधेरों मे ,,,,,,,,,,,,,

धूमिल आहट को धोखे मे रखतीं रातें काली ।
सुबह सजाये सूरज लाता भावुकता की थाली ।
मन के बागों
मे ख़ुशबू भर
पुरवाई बहती रहती है ।
रातों मन के अंधेरों मे ,,,,,,,,,,,,
राम केश मिश्र

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रकमिश सुल्तानपुरी
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रकमिश सुल्तानपुरी मैं भदैयां ,सुल्तानपुर ,उत्तर प्रदेश से हूँ । मैं ग़ज़ल लेखन के साथ साथ कविता , गीत ,नवगीत देशभक्ति गीत, फिल्मी गीत ,भोजपुरी गीत , दोहे हाइकू, पिरामिड ,कुण्डलिया,आदि पद्य की लगभग समस्त विधाएँ लिखता रहा हूं । FB-- https ://m.facebook.com/mishraramkesh मेरा ब्लॉग-gajalsahil@blogspot.com Email-ramkeshmishra@gmail.com Mob--9125562266 धन्यवाद ।।

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