नन्हीं गुड़िया

Dr.Priya Sufi

रचनाकार- Dr.Priya Sufi

विधा- कविता

मैं नन्ही सी प्यारी गुडिया
मम्मी की दुलारी गुडिया
चंदा है मामा मेरे
पापा के मन न भाई गुडिया
मुझे उठाया पास बिठाया
साथ ले जा कर खूब घुमाया
घर न मिला न ही गोदी
कूड़े के ढेर बिठाई गुडिया
रात हुई पर सुबह न आयी
भूख लगी तो खूब चिल्लाई
कोई भी तो पास न आया
कुत्तों ने बहलाई गुडिया
किसी ने हाथ किसी ने पाँव
किसी ने जांघ किसी ने कान
टुकड़ा टुकड़ा बंट गयी तो….
कुत्तों ने भूख मिटाई गुडिया..!

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Dr.Priya Sufi
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हम फकीरों का बस इतना सा फ़साना है, न अम्बर मिला न ज़मीं पे आशियाना है।

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