नदी जो इक नारी है

लोधी डॉ. आशा 'अदिति'

रचनाकार- लोधी डॉ. आशा 'अदिति'

विधा- कविता

पर्वतों से पिघलती नदियाँ
खिलखिलाती हुई
इठलाती हुई
चट्टानों से खेलती
निच्छल
निकल पड़ती हैं
सागर की चाह में

युवा नदियाँ
पहाड़ों से आलिंगनबद्ध होकर
निकलती हैं मचलती हुई
रास्तों में बसाती जाती हैं
कई नगर, कई शहर
कई सभ्यताएं
कई संस्कृति
हरे-भरे खेत
झाड़ियाँ और कुछ जंगल भी

यूँ ही अनवरत चलते चलते
न थकती है, न रूकती हैं
बस थोड़ी उम्रदराज हो जाती हैं नदियाँ
पर नहीं भूल पाती हैं नारी स्वभाव
अभी भी बस मन में होता है
सिर्फ देने का ही भाव

पुरुष अपने स्वभाव के अनुरूप
बांधता चला जाता है
उस निर्झरणी को बन्धनों में
फिर उसके अस्तित्व से खेलकर
मलिन करता जाता है
मिटाता जाता है
उसकी पहचान

नदी चीखती है
पुकारती है
अपनी पहचान बचाने
पर जितना चीखती है वो तटिनी
स्वार्थ में अँधा इंसान
और कसता चला जाता है शिकंजा
मिटाने नदी की पहचान

ओह मानव!
नदी नहीं भूल पाती कभी
कि
वो भी तो इक नारी है
जिसके भाग्य में लिखा है
सिर्फ दूसरों के लिए जीना
जिसकी अपनी कोई पहचान नहीं होती

वो अपनी पहचान बनाने की
कभी कोशिश करती भी है तो
मिटा दी जाती है
बीच सफर में
अंततः नहीं पहुँच पाती कभी
वो सागर तक

और बन जाती है एक इतिहास
अपने अन्दर समेटे हुए
वर्षों का इतिहास

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लोधी डॉ. आशा 'अदिति'
भोपाल
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लोधी डॉ. आशा 'अदिति'
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मध्यप्रदेश में सहायक संचालक...आई आई टी रुड़की से पी एच डी...अपने आसपास जो देखती हूँ, जो महसूस करती हूँ उसे कलम के द्वारा अभिव्यक्त करने की कोशिश करती हूँ...पूर्व में 'अदिति कैलाश' उपनाम से भी विचारों की अभिव्यक्ति....

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