नज़र बता रही है इसे उल्फ़त रही है …….

suresh sangwan

रचनाकार- suresh sangwan

विधा- गज़ल/गीतिका

नज़र बता रही है इसे उल्फ़त रही है
किस तरह मजबूर दिल की हालत रही है

दर्द-ओ-ग़म कहीं सीने में दफ़न करके
खुश- खुश रहने की मेरी आदत रही है

टूटकर बिखर जाता तो फिर ना टूटता
क्यूँ दिल में जुड़ने की ताक़त रही है

हैं आज भी चाँद – तारे आस्माँ पर
दुनियां में तोड़ने की चाहत रही है

तू हासिल नहीं मुझे मगर फिर भी तेरे
आसपास होने से बड़ी राहत रही है

भाग-दौड़ ज़माने की तेज़ धूप में भी
तेरी याद इस दिल में सलामत रही है

कौन झुकता है'सरु'यहाँ किसी सिजदे में
मोहब्बत ही सदियों से इबादत रही है

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