नजर आता है

Rishav Tomar (Radhe)

रचनाकार- Rishav Tomar (Radhe)

विधा- गज़ल/गीतिका

मुझे हर तरफ कुछ ऐसा नजर आता है
कोई अपना मुझसे खफा नजर आता है

गर हँसने का नाम ही अगर ज़िन्दगी है
तो मुझे हँसी में कोई गम नजर आता है

तलाश में उनकी पत्थर से हो गया हूँ
तब उनका सिर झुकता नजर आता है

कल उनकी रानाइयाँ से जहाँ कायल था
आज उनका मुझे बुढापा नज़र आता है

जो कल पुराना देख कर हँसते थे कभी
आज वो नया भी पुराना नज़र आता है

वो थी तो जमाने की भीड़ थी पीछे
उसके बाद सिर्फ ये गम नज़र आता है

जिस डाली से टूटा है गुलाब चाहत का
वो शाख हाल बेहाल नज़र आता है

किसी को क्या लेना शाख के पत्ते से
टूटने पर शजर परेशां नजर आता है

जिसके आगोश में तिल तिल जला
वो शख्स मुझे धुआं नजर आता है

जिसके दरमियां जुगनुओं का वसेरा था
वो मुझे आज कल अंधेरा नजर आता है

जो कही जमी है धूल मेरे चेहरे पर
पर मुझे ये आयना मैला नजर आता है

मुकदर है तो मेरा किसी हसीन सपने सा
जिसमे सब कुछ बड़ा झूठा नजर आता है

ये चाहत ऋषभ शायद पानी जैसी है
जिसमे सब कुछ बहता नजर आता है

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Rishav Tomar (Radhe)
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ऋषभ तोमर पी .जी.कॉलेज अम्बाह मुरैना बी.एससी.चतुर्थ सेमेस्टर(गणित)

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