धूप छाँव (डाॅ. विवेक कुमार)

Dr. Vivek Kumar

रचनाकार- Dr. Vivek Kumar

विधा- कविता

है आज मुझमें सामर्थ्य
खड़ा हूँ पैरों पर अपने
इसलिए तुम
रोज ही आते हो मेरे घर
मेरा हालचाल पूछने।

बाँधते हो तारीफों के पुल
आज बात-बात पर।
किंतु मैं अपने अतीत को
अब तक नहीं भुला पाया हूँ।

गर्दिश के उन दिनों में
तुम दूज के चाँद बन बैठे थे
घर पर रहने के बाद भी
'नहीं है घर में कहलवा देते थे
कैसे भूलूँ उन क्षणों को मित्र,
जब तुम मुझे देख कर भी
अनदेखा कर देते थे,
यह सोच कर कि,
शायद मैं तुमसे
कुछ माँग ना बैठूँ।

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Dr. Vivek Kumar
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नाम : डॉ0 विवेक कुमार शैक्षणिक योग्यता : एम0 ए0 द्वय हिंदी, अर्थशास्त्र, बी0 एड0 हिंदी, पी-एच0 डी0 हिंदी, पीजीडीआऱडी, एडीसीए, यूजीसी नेट। उपलब्धियाँ : कादम्बिनी, अपूर्व्या, बालहंस, चंपक, गुलशन, काव्य-गंगा, हिंदी विद्यापीठ पत्रिका, जर्जर-कश्ती, खनन भारती, पंजाबी-संस्कृति, विवरण पत्रिका, हिंदुस्तान, प्रभात खबर,राँची एक्सप्रेस, दक्षिण समाचार, मुक्त कथन, वनवासी संदेश, प्रिय प्रभात, आदि पत्र-पत्रिकाओं में शताधिक रचनाएँ प्रकाशित। आकाशवाणी केन्द्र, भागलपुर से समय-समय पर रचनाओं का प्रसारण. E-mail - vivekvictor1980@gmail.com

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