धुंध की चादर मे शहर सिसक रहा है

NIRA Rani

रचनाकार- NIRA Rani

विधा- कविता

न जाने क्यू दिल मे कुछ हलचल हो रही थी
द्वार पे जाकर देखा तो इक पेड़ पे बनी थी

नश्तर लिए हाथो मे पत्ते कतर रहे थे
जी जान से जुटे थे इक पल न ठहर रहे थे

मुंडित किया सिरे से अब ठूंठ सा खड़ा था
पत्ते बिना वो पेड़ अब गिरने को हो चला था

आलय दिया धरा ने
पुष्पित किया पवन ने
बूंदों ने पल्लवित किया था …..
रवि के ताप से जगमग हो चला था …..
पर !!!

मारी कुल्हाड़ी ऐसी बस ढेर हो चला था
टुकड़े किए हजारो ढो के ले चला था

अजब सा मंजर था ये क्या हो रहा था
जीते जी उसने उपकार ही किया था

कुछ नही तो प्राण वायु ही दे रहा था
मर कर भी वो कुछ तो दे रहा है

घर बार को किवाड़ और बिस्तर दे रहा है
फिर भी इसॉ उसके प्राण ले रहा है

अन्जान हो खुद को मलिन कर रहा है
बढ़ते प्रदूषण मे खुद ही सिमट रहा है
स्वयं को प्रक्रति दूर कर रहा है
आपदा को स्वयं ही न्योता दे रहा है
सच….
धुंध की चादर मे शहर सिसक रहा है
धुंध की चादर मे शहर सिसक रहा है

Views 47
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
NIRA Rani
Posts 61
Total Views 2.5k
साधारण सी ग्रहणी हूं ..इलाहाबाद युनिवर्सिटी से अंग्रेजी मे स्नातक हूं .बस भावनाओ मे भीगे लभ्जो को अल्फाज देने की कोशिश करती हूं ...साहित्यिक परिचय बस इतना की हिन्दी पसंद है..हिन्दी कविता एवं लेख लिखने का प्रयास करती हूं..

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia