धर्म प्रेम-प्रवाह है,आइना है,कोई तस्वीर नहीं,

Mahender Singh

रचनाकार- Mahender Singh

विधा- कविता

धर्म कोई लकीरें नहीं,
स्वभाव है,
सहज है,
सतत है,
प्रवाह है,
खड़ा हुआ पानी नहीं,
बहता हुआ झरना है,
.
निजता है,
जीव का चैतन्य है,
उसका विवेक है धर्म,
हर पल,हर क्षण, सतत जागरण है धर्म,
.
लोगों ने बाँट डाला,
बाँध डाला,
जनेऊ से बाँध डाला,
खतना कर बदल डाला,
नख शिखा तक पहचान बता डाली,
.
धरा पर स्वायत्ता और स्वछंदता को
पराधीनता में जकड़ डाला,
जकड़ डाला,जकड़ डाला,
.
पशु-पक्षियों,
चाँद-सितारे,
प्रभाकर तक को नहीं छोड़ा,
नहीं छोड़ा, नहीं छोड़ा,
.

डॉ महेन्द्र सिंह खालेटिया,रेवाड़ी, हरियाणा

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Mahender Singh
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पेशे से चिकित्सक,B.A.M.S(आयुर्वेदाचार्य)

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