धर्मसंकट

पं.संजीव शुक्ल

रचनाकार- पं.संजीव शुक्ल "सचिन"

विधा- कहानी

सन्नाटे को चीरती दशरथ की करुण पुकारा हे राम.. हे.राम…. हे राम
पुत्र के प्रति उनके प्रेम रूपी अथाह सागर में समूचा जनमानस डूबा जा रहा था। कुछ हीं पलों बाद दशरथ जी ने प्राण त्याग दिये।
सभी के आंखों में आंशुओं का शैलाब घुमण रहा था ऐसा लग रहा था जैसे किसी भी समय ये बादलों की भाती बरस पड़ेंगे।
संजू ऐसा पुत्र के प्रति प्रेम देख कर भावविभोर हो रहा था और अपने वर्तमान स्थिति का आंकलन कर रहा था।
वो अपनी सोच में इस कदर डूब गया कि उसे पता ही नहीं चला कब रामायण की कहानी दशरथ जी के मृत्यु से राम भरत मिलाप तक आ पहुंची।
राम को राजगद्दी सौपने के लिए भरत की विह्वलता ने एक बार फिर से संजू की तंद्रा भंग की
वह सोचने पर विवश हो क्या दो भाईयों के मध्य कभी इतना भी प्रेम, समर्पण का भाव हो सकता है।
अगर रमायण में दिखाये गये पात्र इसकी संपूर्ण कहानी अगर सत्य है तो फिर आज और तब के
बीच के समय में आखिर ऐसा क्या हो गया जो पिता के लिए पुत्र, पुत्र के लिए पिता, भाई के लिए भाई के दिलों में इतनी नफरत घुल गई।
आज फिजा में चहुओर नफरत का, बेईमानी का, धोखाधड़ी का, सम्राज्य स्थापित हो चूका है
जब संस्कार पूर्वजों से ही विरासत में मिलती है तो फिर ऐ बुरे आचरण, संस्कारहीनता, अपने ही रक्त के प्रति दुर्भावना ऐसे आचरण कहाँ से प्राप्त हुये।
संजू की सोच धीरे धीरे ब्यापक होने लगी।
चलो माना राम भगवान विष्णु के अवतार थे किन्तु राक्षसी प्रवृत्ति वाले कुम्भकर्ण और मेघनाथ ने भी भ्रातृ एवं पितृ प्रेम की मिसाल कायम की उस जमाने में।
जब ऐसी संस्कृति में हमारी उत्पति हुई तो ऐसे कुविचार, दुर्भावना कहाँ से उत्पन्न हुई।
आज पुत्र पिता को बोझ समझ उससे घृणा करने लगा है, पिता पुत्र से द्वेष करने लगा है भाई भाई का दुश्मन बना पड़ा है। आखिर ये विद्वेषपूर्ण संस्कार आये कहां से।
संजू की मनःस्थिति बहुत ही दयनीय हो चली थी
सोच की दिशा जैसे आत्मीय रिश्तों पे ठहर सी गई थी।
संजू भी दो भाई था वह बड़ा था और एक उससे छोटा था जो माता पिता का अत्यधिक दुलारा था।
पिता के नजर में संजू की स्थिति बहुत हीं दयनीय थी आये दिन लड़ाई झगड़े होते रहते थे।
अपने ही घर में अपनो के बीच रहकर भी परायों जैसा ब्यवहार सहन करना फडता उसे।
वह सबके दुख सूख का साथी था किन्तु उसके दुख में कोई साथ देने को तैयार न होता कोई उसपे बिश्वास न करता।
वह प्रेम के वशीभूत अपनों से अलग होना नहीं चाहता था और परिस्थितियाँ साथ रहने की इजाजत नहीं दे रही थीं ।
आज लगभग कईएक घरो की स्थिति संजू जैसी है
अब प्रश्न यह है कि ऐसे हर एक संजू करें तो क्या करें?
पत्नी कि सुने तो माता पिता बैरी। माता पिता की सुने तो पति और पिता का फर्ज की हत्या।
अब ऐसे धर्मसंकट की स्थिति में आखिर संजू क्या करे?
©®पं.संजीव शुक्ल "सचिन"

Sponsored
Views 16
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
पं.संजीव शुक्ल
Posts 101
Total Views 868
मैं पश्चिमी चम्पारण से हूँ, ग्राम+पो.-मुसहरवा (बिहार) वर्तमान समय में दिल्ली में एक प्राईवेट सेक्टर में कार्यरत हूँ। लेखन कला मेरा जूनून है।

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia