धरती पुलकित हो उठे आज

Dr. umesh chandra srivastava

रचनाकार- Dr. umesh chandra srivastava

विधा- कविता

धरती पुलकित हो उठे आज
जगती का दुःख हरना होगा ।
इस कर्म-भूमि में असुरों से
फिर धर्म-युद्ध करना होगा ।।
कितने वीरों ने झूम-झूम
फाँसी का फंदा चूम-चूम ।
अपनी रक्तिम प्रति बूँद-बूँद
अर्पित की आँखें मूँद-मूँद ।।
इतिहास रचा हर बाला ने
गर्वित होकर कहना होगा । इस कर्म-भूमि
कटते दुष्टों के रुण्ड-मुण्ड
गिरते भू पर थे झुंड-झुंड ।
थी नीति कृष्ण की धूम-धूम
अर्जुन वाणो ने घूम-घूम ।।
उत्थान किया था भारत का
संस्मरण तुम्हें रखना होगा । इस कर्म-भूमि
मत शक्ति स्वयं की भूल-भूल
उठ सिन्धु लाँघ तू कूल-कूल।
बल,क्षमा-नीति का मूल-मूल
दुर्बलता जग का शूल-शूल।।
क्यों चुप बैठे हो युवा आज
मानव हित में मरना होगा ।
परिजन, यदि दुर्जन,नाश करो
अर्जुन सा दुःख सहना होगा ।।
इस कर्म-भूमि ………।

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Doctor (Physician) ; Hindi & English POET , live in Lucknow U.P.India

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