दो बह्र पर एक प्रयास

amod srivastava

रचनाकार- amod srivastava

विधा- गज़ल/गीतिका

दो बहरी गजल:-
1बह्र:-2122-1122-112­2-112
2बह्र:-2122-2122-212­2-212

बेसबब रिश्ते -ओ-नातों के लिए बिफरे मिले।।
जब मिले मुझको मेरे सपने बहुत उलझे मिले।।

ज़िन्दगी जिनसे मिला सब ही बड़े नम से मिले।।
मैं उसे समझू मसीहा जो जरा हँस के मिले।।

रुक जरा पूछे इन्हे कैसी कठिन राहें रही।
ये मुसाफिर हैं पुराने आज हम जिनसे मिले।।

उस नदी का है समर्पण जो सदा बहती रहे।
राह जीवन की चले चलते हुए सब से मिले।।

जिंदगी जिनसे गुलाबी है मेरी रंगों भरी।
बस यही ख्वाहिस रहेगी वो दिये जलते मिले।।

होले होले से गुजर जाती रही अहदे वफ़ा*। promises
जब मिली यादें तेरी सपने मुझे तर-से मिले।।

लोक नजरों से मुखातिब* जो मुकम्मल* से रहे।
जानेपहचाने/ पुरे,सम्पूर्ण
उनके सिरहाने दबे ख़त भी मुझे भीगे मिले।।

हाले-दिल राहें- सफ़र ही मेरी गजलो की सदा।
गुनगुनाता हूँ इन्हे जब तो लगे अपने मिले।।
मौलिक/अप्रकाशित
आमोद बिन्दौरी

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amod srivastava
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