दोहे । चोटी कटवा भूत ।

रकमिश सुल्तानपुरी

रचनाकार- रकमिश सुल्तानपुरी

विधा- दोहे

दोहे

शब्द शब्द की नाप से, भावों पर अनुबंध ।
दिन दिन यों बढ़ता गया, महक रही न गन्ध ।

शब्द कुसुम को गूंथता शब्दो पर नव छन्द ।
भाव ठिठुरने यो लगे ,ज्यो कँकरीली कन्द ।

कुंठित भाव प्रवाह गति, तनिक हो रही मन्द ।
'राम' विकारी , काम का , छंद नही वह छंद ।

राजनीति के पाठ मे जाति जाति मे पात ।
पढ़े पहाड़ा पांच का पचपन पे रुकि जात ।

चोटीकटवा भूत से , नारि हुई सब मौन ।
हेल्मेट पहने जागती, सोते पुरुष अलोन ।

चोटी की अदभुत कथा, अफ़वाहों की बात ।
चोटी कटवा भूत कम,, शंका अधिक सुझात ।

राम, सभी समझाइये, घर निज पास पड़ोस ।
अफ़वाहों को त्याग दें, बिना किये अफ़सोस ।

रक्षाबंधन प्रेम का,,,,,,,,जीवन मे उपहार ।
भाई बहनों के लिये, खुशियों का त्योहार ।

राम केश मिश्र

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रकमिश सुल्तानपुरी
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रकमिश सुल्तानपुरी मैं भदैयां ,सुल्तानपुर ,उत्तर प्रदेश से हूँ । मैं ग़ज़ल लेखन के साथ साथ कविता , गीत ,नवगीत देशभक्ति गीत, फिल्मी गीत ,भोजपुरी गीत , दोहे हाइकू, पिरामिड ,कुण्डलिया,आदि पद्य की लगभग समस्त विधाएँ लिखता रहा हूं । FB-- https ://m.facebook.com/mishraramkesh मेरा ब्लॉग-gajalsahil@blogspot.com Email-ramkeshmishra@gmail.com Mob--9125562266 धन्यवाद ।।

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