दोहे-एकादश

Rajendra jain

रचनाकार- Rajendra jain

विधा- दोहे

बसंत(फागुन) पर देखिए हमारा प्रयास….

दोहे-एकादश

शरद विदाई शुभ घड़ी,
ऋतु बसंत महकाय।
सुरभित सुमन सुवास नभ,
सुरमय कंठ सुहाय।।

रँग बसंती चूनरी,
देख सखी मुस्काय।
करधन नथ बेंदी सजी,
सजन हिये बस जाय।।

होली खेलन की घड़ी,
मन मे उठी तरंग।
अंग अंग पुलकित भए,
होली के सब.रंग।।

आम्र बोर की गंध से,
कोयल का सुरनाद।
वनचर मस्ती मे दिखें,
बछड़े बैठे माद।।

देखो फूल पलाश के,
फूल रहे चहुँओर।
धरा चँदोवा देखकर,
पंछी करते शोर।।

हँसी ठिठोली जब करें
देवर भाभी संग।
सतरंगी मन बन चला,
फागुन केशर रंग।।

रंग गुलावी मन बना,
चला खोजने प्रेम।
रंग गुलावी कर थमा,
मिले तभी रे प्रेम।।

तेरे अपने तो सभी,
पर सब अपने होंय।
अपनेपन के भाव जब,
होली के संग होंय।।

शब्द शब्द संगीत रे,
देख बसंती गान।
अपने पन का शोर भी,
अपनेपन का गान।।
१०
देखो तितली खुशी से,
उड़ती पंख पसार।
बंदर की टोली सजी,
अद्भुत उनका प्यार।।
११
फागुन से गुन लीजिए,
गुन महकें सब ओर।
भेद भाव सब भूलकर,
'अनेकांत'मन मोर।।

राजेन्द्र'अनेकांत'
बालाघाट दि.१०-०२-१७

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Rajendra jain
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प्रकृति, पर्यावरण, जीव दया, सामाजिक चेतना,खेती और कृषक की व्यथा आदि विषयों पर दोहा, कुंडलिया,चोपाई,हाईकु आदि छंद बद्ध तथा छंद मुक्त रचना धर्मिता मे किंचित सहभागिता.....
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