देश प्रेम

MridulC Srivastava

रचनाकार- MridulC Srivastava

विधा- तेवरी

करने दो हुंकार अब,बस मातृभूमि का सत्कार अब
बजने दो मृदंग,कर दो संखनाद अब,
भरो कुछ ऐसा ही दम्भ,कण कण में दिखे देश प्रेम का रंग,
चूल्हे हिले,भूचाल मानो,सर्वनाश की आहट पहचानो,
जीना सीखो और जीने दो कही छिंड जाये न धर्म-पाप की जंग ll

मृदुल चंद्र श्रीवास्तव

Views 38
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
MridulC Srivastava
Posts 39
Total Views 1.1k
हीरे सजा रखे हैं तिलक सा माथे उन्हें माटी का कोई मोल नहीं, माटी ही हूं इस भूमि का,अभिमान मुझे, इस माटी का कोई मोल नहीं

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia