देखो न मुझ से रूठ के दिलबर चला गया — गज़ल

निर्मला कपिला

रचनाकार- निर्मला कपिला

विधा- गज़ल/गीतिका

देखो न मुझ से रूठ के दिलबर चला गया
अब लौट कर न आएगा कहकर चला गया

कैसे पकड़ सके जिसे रब ने बचा लिया
पैकान से परिंदा जो उड कर चला गया

जो उम्र भर जुदा रहा गम ले गया उसे
वो रूह मुझ को दे गया पैकर चला गया

नजरें जिसे थी ढूंढती दिन रात जाग कर
वो ख़्वाब में आया मुझे छूकर चला गया

कठपुतलियाँ हैं हम यहाँ क्या हाथ अपने है
बस वक्त ले गया था जिधर उधर चला गया

जो उम्र भर जुदा रहा गम ले गया उसे
वो रूह मुझ को दे गया पैकर चला गया

रिश्तों को तार तार होते देर क्या लगी
सैलाब नफरतों का था आकर चला गया

बचपन मेरा ले आओ बुढ़ापा न चाहिए
ये चाल वक्त कैसी दिखा कर चला गया

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निर्मला कपिला
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लेखन विधायें- कहानी, कविता, गज़ल, नज़्म हाईकु दोहा, लघुकथा आदि | प्रकाशन- कहानी संग्रह [वीरबहुटी], [प्रेम सेतु], काव्य संग्रह [सुबह से पहले ], शब्द माधुरी मे प्रकाशन, हाईकु संग्रह- चंदनमन मे प्रकाशित हाईकु, प्रेम सन्देश मे 5 कवितायें | प्रसारण रेडिओ विविध भरती जालन्धर से कहानी- अनन्त आकाश का प्रसारण | ब्लाग- www.veerbahuti.blogspot.in

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6 comments
  1. बहुत खूब निरमला जी ..कठपुततलियॉ है हम यहं क्या हाथ अपने है …nice

  2. बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल आप की……गुस्तखी माफ़….मैंने नया नया लिखना शुरू किया है इसलिए आप से पूछना चाहता हु की आप ने कौन सी बह्र में लिखा है आपने…..मैं भी लिखता हु पर बह्र में नहीं लिख पता इसलिए पूछा है आप से

  3. निर्मला जी ये गज़ल का शीर्षक जब से पढ़ा हूँ …..अब तक वही गुनगुना रहा हूँ

    आपकी ये गज़ल शायद पहले भी पढी थीं

    मुझे बहुत पसंद आई
    धन्यवाद !!