दूसरा पहलू

Shubha Mehta

रचनाकार- Shubha Mehta

विधा- कविता

देखा पलट के
पीछे की ओर
था नज़ारा वहाँ कुछ और
होठों पे थी मुस्कान
जैसे ओढ़ी हुई
उस के पीछे
छुपा दर्द भी
देखा था मैनें
हक़ीक़त यही थी
न हँसना ,न रोना
न प्यार ,न उसका अहसास
कहने को तो सभी थे अपने
फिर भी पाया अकेला स्वयं को
सब कुछ था फिर भी
दिल का एक कोना था उदास ।

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Shubha Mehta
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4 comments
  1. हर जगह महफ़िल सजी पर दर्द भी मिल जायेगा
    अब हर कोई कहने लगा है आरजू बनवास की

    मौत के साये में जीती चार पल की जिंदगी
    क्या मदन ये सारी दुनिया, है बिरोधाभास की

    सुन्दर प्रस्तुति बहुत ही अच्छा लिखा आपने