दूर जो तुझसे हुआ प्रिय……

पं.संजीव शुक्ल

रचनाकार- पं.संजीव शुक्ल "सचिन"

विधा- मुक्तक

दूर जो तुझसे हुआ प्रिय नयना अभिराम लरजता है
सावन की रिमझिम बूंदों को मन देखता और तरसता है
जो साथ तुम्हारे मैं होता जीवन कितना सुन्दर होता
यहीं सोच हृदय को बेध रहा नैनो से नीर बरसता है।
©®पं.संजीव शुक्ल "सचिन"

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पं.संजीव शुक्ल
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मैं पश्चिमी चम्पारण से हूँ, ग्राम+पो.-मुसहरवा (बिहार) वर्तमान समय में दिल्ली में एक प्राईवेट सेक्टर में कार्यरत हूँ। लेखन कला मेरा जूनून है।

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