दूध के दाँत

हरीश लोहुमी

रचनाकार- हरीश लोहुमी

विधा- लघु कथा

दूध के दाँत
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-डाक्टर साहब ! मुझे ये वाला दाँत निकलवाना है !

-इसे निकलवाने की क्या जरूरत है बेटा ! कच्चा दांत है ! दूध के दाँत खुद ही निकल जाते हैं बेटा !

-अपनी फीस बताइये डाक्टर साहब ! ज्यादा टाल-मटोल मत कीजिए ! परेशान हो चुका हूँ मैं दूध के इन दाँतों से ! जब भी कोई डिसीजन लेने जाता हूँ, माँ-बाप भी ताने देते हैं । कहते हैं- “दूध के दाँत तो टूट जाने दो ” !

– आज मैं तुड़वा कर ही रहूँगा दूध के इस आखिरी दाँत को ! अपनी राह के रोड़े को !

… बेटा अब बड़ा हो रहा था ।
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हरीश चन्द्र लोहुमी, लखनऊ (उ॰प्र॰)
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हरीश लोहुमी
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कविता क्या होती है, नहीं जानता हूँ । कुछ लिखने की चेष्टा करता हूँ तो फँसता ही चला जाता हूँ । फिर सोचता हूँ - "शायद यही कविता हो जो मुझे रास न आ रही हो" . कुछ सामान्य होने का प्रयास करता हूँ, परन्तु हारे हुए जुआरी की तरह पुनः इस चक्रव्यूह में फँसने का जी करता है ।

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2 comments
  1. 😊😊कहाँ कहाँ से निकाल कर लाते हैं आप ये idea । वाह्ह्ह्ज्ज्ज् ।

    • दूध के दाँत हैं …. खुद-ब-खुद निकलते रहते हैं 🙂 हार्दिक आभार !