दीवारो के भी कान होते है।

Vindhya Prakash Mishra

रचनाकार- Vindhya Prakash Mishra

विधा- कविता

किसी के महल भी सूने
किसी झोपडी के मकान होते है
महल मे भगवान रहते है
झोपडी मे इंसान होते है
मंदिर है जहां भगवान होते है
मस्जिद मे सदा रहमान होते है।
चेहरे पढना सीख लो विन्ध्य
यहां सज्जन के वेश मे शैतान होते है।
समझकर मांगिये मदद अमीरो से
मदद करते कहां है बडे गुमान होते है
शांत रहते है कभी याद नही रहती शक्ति
देखो इसी समाज मे कई हनुमान होते है।
चुपचाप छिपाया है ताकत अपनी
बोलते नही दिल मे कई तूफान होते है
गरीबी का मजाक उडाते है मदद नही करते
कैसे कैसे लोग धनवान होते है।
सम्भलकर बोलिये जनाब
यहा दीवारो के भी कान होते है।

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Vindhya Prakash Mishra
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