दीदार अधुरा था

Govind Kurmi

रचनाकार- Govind Kurmi

विधा- कविता

हूश्न के द्वार पर देखा, हूश्न जुल्फों में उलझा था!

मिला दिल को सुकूं कि, ऐसा हमने नजारा देखा था!

उसकी भीगी जुल्फों में, आंखें ठहरी दिल खोया था!

हम खोये नीली आंखों में, जब उसने हमको देखा था!

वो पलटी मूं युं बनाकर, अब उसको हमपर शक था!

हम फिदा हुये इस कारीगरी पर, यह उसको भी एहसास था!

ऐसा हुआ था पहली बार, जब हमने उससे कुछ मांगा था!

दो पल और दे ऐसे खुदा, ऐ दीदार अभी अधूरा था!

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Govind Kurmi
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गौर के शहर में खबर बन गया हूँ । १लड़की के प्यार में शायर बन गया हूँ ।

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