दास्ताँ ऐ मोहब्बत

डॉ सुलक्षणा अहलावत

रचनाकार- डॉ सुलक्षणा अहलावत

विधा- गज़ल/गीतिका

दिल के दरवाजे पर नजरों से दस्तक दी थी कभी,
दबे पैर आकर मेरी जिंदगी में आहट की थी कभी।

कोरा कागज था जीवन मेरा तुमसे मिलने से पहले,
कोरे कागज को भरने के लिए मोहब्बत की थी कभी।

उन दिनों मेरी तन्हाई को आबाद किया तेरे साथ ने,
बैठो पल दो पल तुम साथ मेरे, यूँ दावत दी थी कभी।

इजहार ऐ मोहब्बत तुमने किया था नजरों से अपनी,
दिल के पन्ने पर मोहब्बत की लिखावट दी थी कभी।

कैसे भूल सकते हो तुम राजाओं सा स्वागत किया था,
दिवाली नहीं थी पर दिवाली सी सजावट की थी कभी।

मेरे दिल की सल्तनत पर आज भी तुम्हारा ही राज है,
इसी सल्तनत को पाने के लिए बगावत की थी कभी।

कैसे रहे तुम मेरे बिन, तुम्हारे जाने से लाश बन गयी मैं,
तेरे जाने के बाद खुदा से तेरी शिकायत की थी कभी।

यकीं था मोहब्बत और खुदा पर लौट कर आओगे तुम,
तुम्हें पाने को सुलक्षणा खुदा की इबादत की थी कभी।

©® डॉ सुलक्षणा अहलावत

बेहतरीन साहित्यिक पुस्तकें सिर्फ आपके लिए- यहाँ क्लिक करें

Views 37
इस पेज का लिंक-
Sponsored
Recommended
Author
डॉ सुलक्षणा अहलावत
Posts 114
Total Views 15.8k
लिख सकूँ कुछ ऐसा जो दिल को छू जाये, मेरे हर शब्द से मोहब्बत की खुशबु आये। शिक्षा विभाग हरियाणा सरकार में अंग्रेजी प्रवक्ता के पद पर कार्यरत हूँ। हरियाणवी लोक गायक श्री रणबीर सिंह बड़वासनी मेरे गुरु हैं। माँ सरस्वती की दयादृष्टि से लेखन में गहन रूचि है।

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


Sponsored
हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia
One comment