तो किस्मत हार जाती है

बसंत कुमार शर्मा

रचनाकार- बसंत कुमार शर्मा

विधा- गज़ल/गीतिका

लगन से की गई मेहनत, नहीं बेकार जाती है
अगर दम कोशिशों में हो, तो किस्मत हार जाती है

बड़ी बेचैन रहती है, किनारे पर भी’ ये कश्ती
कभी इस पार जाती है, कभी उस पार जाती है

किया वादा अगर उसने, मुझे मंदिर में मिलने का
बुलाती है मुझे शनिवार खुद इतवार जाती है

ख़ुशी है आजकल रूठी मेरे आँगन मेरे घर से
गली में हर मोहल्ले में, सभी के द्वार जाती है

वफ़ा की सब किताबों को, पढ़ा मैंने भी’ उसने भी
न जाने कौन से रस्ते, मेरी सरकार जाती है

समा जाती है धड़कन में, निकलती ही नहीं दिल से
ये मेरे प्यार की खुशबू, जहाँ इक बार जाती है

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बसंत कुमार शर्मा
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भारतीय रेल यातायात सेवा (IRTS) में , जबलपुर, पश्चिम मध्य रेल पर उप मुख्य परिचालन प्रबंधक के पद पर कार्यरत, हिंदी में छंद में गीत, गजल/गीतिका, दोहे एवं व्यंग्य लेखन
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