**** तेरे छूने से ***

भूरचन्द जयपाल

रचनाकार- भूरचन्द जयपाल

विधा- कविता

तेरे छूने से एक
सिहरन सी उठती है
जो तुझे और मुझे
अंतर तक
हिला देती है
इक भूकम्प सा
ला देती है
न तुम सम्भल पाते
ना हम ।।
दोनों लड़खड़ाकर कर
गिर पड़ते हैं बिस्तर पर
तो ऐसा लगता है कि
भूचाल आ गया हो
बिस्तर की भी रूह
कांप जाती है
पलंग तो क्या
धरती भी हिल जाती है ।।
दीवारें भी सुनने
लगती हैं
शायद कयामत
आ गयी हो
फिर कुछ क्षण बाद
तूफ़ान के पश्चात
शांति का
अहसास होता है
शायद दो तारों का
वह रुक-रुक के मिलना
ख़तरे का अहसास
या एक विस्फोट
मिलने के पूर्व का
मिलने के पश्चात
एक होने पर
परम् शांति
कतरा-कतरा
नदी का सागर में
मिलने को आतुर
अब शायद
नदी नदी नहीं
सागर का ही
प्रतिरूप था ।।
यह सब क्या था
शायद तेरा-मेरा
वह पहला मिलन
था ।।
👍मधुप बैरागी

Sponsored
Views 34
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
भूरचन्द जयपाल
Posts 408
Total Views 5.6k
मैं भूरचन्द जयपाल सेवानिवृत - प्रधानाचार्य राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, कानासर जिला -बीकानेर (राजस्थान) अपने उपनाम - मधुप बैरागी के नाम से विभिन्न विधाओं में स्वरुचि अनुसार लेखन करता हूं, जैसे - गीत,कविता ,ग़ज़ल,मुक्तक ,भजन,आलेख,स्वच्छन्द या छंदमुक्त रचना आदि में विशेष रूचि, हिंदी, राजस्थानी एवं उर्दू मिश्रित हिन्दी तथा अन्य भाषा के शब्द संयोग से सृजित हिंदी रचनाएं 9928752150

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia