तेरी मेरी यारी

लक्ष्मी सिंह

रचनाकार- लक्ष्मी सिंह

विधा- मुक्तक

🌹🌹🌹🌹
कागज है गौर वर्ण जैसे राधारानी।
स्याहीयुक्त कलम जैसे कृष्णमुरारी।
नवरस रूपी नवरंग की निष्पाती,
बरसाना गाँव जैसा तेरी मेरी यारी।1।

खुशियाँ हो या गम हो हमारी।
तुझ से ही करूँ मैं साझेदारी।
ऐ कलम, दवात और स्याही,
रहे जीवन भर तेरी मेरी यारी।2।

तू आशीर्वाद माँ सरस्वती की।
आदत हो गई मुझे लिखने की।
तू ही है इश्क, इबादत, ताकत,
तू जुनून, तू खुदा मेरे मन की।3।

तू ही मेरी सच्ची सखी सहेली।
जानती मेरे मन की हर पहेली।
तू ही शब्दों में सामर्थ्य भरती,
जज्बातों को कागज पे उढेली।4।

जीवन में आशा को जगाती।
मेरे जख्मों पे मलहम लगाती।
मेरे अहसास को लब्ज देती,
मेरी हर दुख दर्द को भगाती।5।

ख्वाबों के बादल पे उड़नेवाली।
मन के टूटे तार को जोड़नेवाली।
परत-दर-परत को हटाती यह,
दिल में छुपे राज को जाननेवाली।6।

अकेलेपन में सदा साथ निभायी।
हर सुख-दुख में तू रिश्ता निभायी।
कभी करती मुझसे हँसी मस्खरी,
यारी की सार्थकता बखूबी निभायी।7।

तेरे जैसा कोई दोस्त नहीं है प्यारी।
तुझ सा नहीं किसी की भागीदारी।
बिना किसी लाग लपेट के सदा,
ये काव्य सरिता बहती रहे हमारी।8।
🌹🌹🌹🌹—लक्ष्मी सिंह 💓☺

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लक्ष्मी सिंह
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