तुम…. तब और अब (हास्य-कविता)

हरीश लोहुमी

रचनाकार- हरीश लोहुमी

विधा- कविता

तुम…. तब और अब
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तब तुम अल्हड़ शोख कली थी,
अब पूरी फुलवारी हो,
तब तुम पलकों पर रहती थी,
अब तुम मुझ पर भारी हो ।

तब तुम चंचल तितली सी थी,
अब तुम एक कटारी हो,
तब थे नैनोनक्श कँटीले,
अब तुम पूरी आरी हो ।

तब तुम चंदा सी लगती थी,
अब पूरी चिंगारी हो,
तब तुम खास थी इस दुनियाँ में,
अब तुम दुनियाँदारी हो ।

तब तुम आइ लव यू कहती थी,
अब तुम देती गारी हो,
तब तुम मेरा क्रेडिट सी थी,
अब तुम मेरी उधारी हो ।

तब तुम नयी नवेली थी,
अब बच्चों की महतारी हो,
तब तुम होगी किसी और की,
अब तुम प्रिये हमारी हो ।

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**हरीश*लोहुमी**
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हरीश लोहुमी
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कविता क्या होती है, नहीं जानता हूँ । कुछ लिखने की चेष्टा करता हूँ तो फँसता ही चला जाता हूँ । फिर सोचता हूँ - "शायद यही कविता हो जो मुझे रास न आ रही हो" . कुछ सामान्य होने का प्रयास करता हूँ, परन्तु हारे हुए जुआरी की तरह पुनः इस चक्रव्यूह में फँसने का जी करता है ।

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2 comments
  1. वाह्ह्ह्ह् वाह्ह्ह्ह् क्या तारीफ़ करने का अंदाज़ है 😊😊हा हा हा