तुम्हारी बिटिया

Jyotsna Misra

रचनाकार- Jyotsna Misra

विधा- कविता

नहीं थी सुफल ,
पूर्व जन्मों की,
मंतव्य किसी यज्ञ की.
मुझे कभी माँगा नहीं गया,
अनगिनत देवताओं से,
हाथ उठा कर,सर नवा कर.
मगर फिर भी मैं थी.
तुम्हारे आंगन में,
रोज़ लगती बुहारी सी.
तुम्हारी छत पर बिना प्रयत्न,
बरसती चांदनी सी.
तुम्हारी नींद में हवा की,
गुदगुदी से पड़ती हलकी ख़लल सी.
तुम्हारी भवों के गिर्द लकीरों सी.
तुम्हारे होंठो के पास,
सलवटो सी.
बाबुल… मैं थी.
न सही कभी जो तुम्हारा हाथ,
मेरे सर तक नहीं आया.
तुम्हारी देहलीज़ ने,
मुझे माथा नवाना तो सिखाया.
तुम्हारा आंगन,
तुम्हारा दालान,
तुम्हारा दरवाज़ा,
तुम्हारा नाम,
सब भैया का सही.
तुम्हारे पुण्य प्रताप,
तुम्हारे हानि लाभ,
तुम्हारे सुख संतोष,
तुम्हारे तीज त्यौहार,
सब भैया ही सही.
तुम्हारी धन दौलत,
तुम्हारे महल अटारी,
तुम्हारे खेत खलिहान,
तुम्हारा आशीर्वाद,
ना मैं कुछ नहीं मांगती.
बस देना चाहती हूँ,
स्वीकार करो,
मेरा धन्यवाद.
तुमने मुझको जन्म दिया,
जीवन दिया,
और जीवित रहने दिया.
मैं थी और मैं हूँ बाबुल.
जिंदा तुम्हारी बिटिया.

Views 275
Sponsored
Author
Jyotsna Misra
Posts 2
Total Views 622
इस पेज का लिंक-

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


Sponsored
Related Posts
हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia