तुम्हारी कमी खलती नहीं

Shanky Bhatia

रचनाकार- Shanky Bhatia

विधा- कविता

बेशक नजरों को तुम दिखती नहीं,
पर तुम्हारी कमी खलती नहीं।

तुम्हारी नज़रों से अब हमारी नज़रें मिलती नहीं,
पर तुम्हारी कमी खलती नहीं।

हमारी मुस्कान भी तुम बिन खिलती नहीं,
पर तुम्हारी कमी खलती नहीं।

अब कोई प्यार की ज्योत तुम्हारे दिल में जलती नहीं,
पर तुम्हारी कमी खलती नहीं।

तुम्हारी बेवफाई में भी शायद तुम्हारी कोई गलती नहीं,
पर तुम्हारी कमी खलती नहीं।

अब कोई अप्सरा हाथ में हाथ लिए साथ मेरे चलती नहीं,
पर तुम्हारी कमी खलती नहीं।

ऐसा अँधियारा छाया कि सूरत अब बदलती नहीं,
पर तुम्हारी कमी खलती नहीं।

तुम्हारे सुंदर होठों से अब प्यार की गंगा निकलती नहीं,
पर तुम्हारी कमी खलती नहीं।

ये गहरी अंधियारी रात भी तो तुम्हारे बिन ढलती नहीं,
पर तुम्हारी कमी खलती नहीं।

अब कोई भी ख्वाहिश इस दिल में पलती नहीं,
पर तुम्हारी कमी खलती नहीं।

ये मुश्किल घडी टाले से भी टलती नहीं,
पर तुम्हारी कमी खलती नहीं।

उखड़ने लगती हैं साँसें भी अब सम्भलती नहीं,
पर तुम्हारी कमी खलती नहीं।

किसी भी सूरत, दिल से तुम निकलती नहीं,
इसलिए तुम्हारी कमी खलती नहीं।

इसलिए तुम्हारी कमी खलती नहीं।

————-शैंकी भाटिया
7 दिसम्बर, 2016

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