तिलचट्टे

महावीर उत्तरांचली

रचनाकार- महावीर उत्तरांचली

विधा- कहानी

"वो देखो दाने-पानी की तलाश में निकलती तिलचट्टों की भीड़," लेबर चौक के चौराहे पर हरी बत्ती की प्रतीक्षा में खड़ी कार के भीतर से किसी ने मज़दूरों के समूह पर घिनौनी टीका-टिप्पणी की।

"हराम के पिल्ले," कार के निकट मेरे साथ खड़ा कलवा उस कार वाले पर चिल्लाया, "हमारा शोषण करके तुम एशो-आराम की ज़िंदगी गुज़ार रहे हो और हमें तिलचट्टा कहते हो। मादर …. !"

माँ की गाली बकते हुए कलवे ने सड़क किनारे पड़ा पत्थर उठा लिया। वह कार का शीशा फोड़ ही देता यदि मैंने उसे न रोका होता। कार वाला यह देखकर घबरा गया और जैसे ही हरी बत्ती हुई वह तुरंत कार को दौड़ाने लगा।

"कलवा पागल हो गए हो क्या तुम?" मैंने उसे शांत करने की कोशिश की।

"हाँ-हाँ पागल हो गया हूँ मैं। हम मज़दूरों की तबाह-हाल ज़िंदगी का कोई आमिरज़ादा मज़ाक उड़ाए तो मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता। साले का सर फोड़ दूँगा। चाहे वह टाटा-बिडला ही क्यों न हो?" कलवा पर जनून हावी था।

"जल्दी चल यार फैक्ट्री का सायरन बजने वाला है, कहीं हॉफ-डे न कट जाये," और दोनों मित्र मज़दूरों की भीड़ में गुम हो गए।

दिन तक माहौल काफी बदल चुका था। सभी मज़दूर बाहर काके के ढाबे पर दिन की चाय पीते थे। गपशप भी चलती थी. जिससे कुछ घडी आराम मिलता था। चाय तैयार थी और मैंने दो गिलास उठा लिए और एक कलवा को पकड़ते हुए कहा," साहब के मिजाज़ अब कैसे हैं? सुबह तो बड़े ग़ुस्से में थे!"

"अरे यार दीनू रोज़ की कहानी है," कलवा ने गरमा-गरम चाय को फूँकते हुए कहा, "घर से फ़ैक्ट्री … फिर फ़ैक्ट्री से घर… अपनी पर्सनल लाइफ़ तो बची ही नहीं… सारा दिन मशीनों की न थमने वाली खडखडाहट। चिमनी का गलघोंटू धुआँ। किसी पागल हाथी की तरह सायरन के चिंघाड़ने की आवाज़। कभी न ख़त्म होने वाला काम… क्या इसलिए ऊपरवाले ने हमें इन्सान बनाया था?" आसमान की तरफ़ देखकर जैसे कलवा ने नीली छतरी वाले से प्रश्न किया हो, "सुबह सही बोलता था, वह उल्लू का पट्ठा… हम तिलचट्टे हैं। क्या कीड़े-मकोड़ों की भी कोई ज़िंदगी होती है? क्या हमें भी सपने देखने का हक़ है?"

"तुम्हारी बात सुनकर मुझे पंजाबी कवि पाश की पंक्तियाँ याद आ रहीं हैं," मैंने हँसते हुए कहा।

"यार तू बंदकर अपनी साहित्यिक बकवास। जिस दिन फ़ैक्ट्री में क़दम रखा था, बी.ए. की डिग्री मैं उसी दिन घर के चूल्हे में झोंक आया था," कहकर कलवा ने चाय का घूँट भरा।

"सुन तो ले पाश की ये पंक्तियाँ, जो कहीं न कहीं हमारी आन्तरिक पीड़ा और आक्रोश को भी छूती हैं," मैंने ज़ोर देकर कहा।

"तू सुनाये बिना मानेगा नहीं, चल सुना," कलवा ने स्वीकृति दे दी।

"सबसे ख़तरनाक है मुर्दा शांति से भर जाना
न होना तड़प का, सब सहन कर जाना
घरों से रोज़गार के लिए निकलना और दिहाड़ी करके लौट आना
सबसे ख़तरनाक है हमारे सपनों का मर जाना,"

मेरे मुख से निकली 'पाश' की इन पंक्तियों ने आस-पास के वातावरण में गर्मी पैदा कर दी। काके चायवाले ने हैरानी से भरकर कहा," अरे तुम दोनों तो बड़ी ऊँची-ऊँची बातें करने लगे हो।"

"काके नपुंसक लोग बातें ही कर सकते हैं और कुछ नहीं!" कहकर कलवा ने ठहाका लगाया, "ज़रा अपना टीवी तो आन कर, कुछ समाचार ही देख लें।"

टीवी पर रात हुए रेलवे दुर्घटना के समाचार को दिखाया जा रहा था। दुर्घटना स्थल के तकलीफ़ देह चित्र। रोते-बिलखते परिवारजन। रेलमंत्री द्वारा मुआवज़े की घोषणा। मृतकों को पाँच-पाँच लाख और घायलों को दो-दो लाख।

"बाप रे…!" पास खड़े मज़दूर ने आश्चर्ये से कहा, "यहाँ दिन-रात मेहनत करके मरने से भी स्साला कुछ नहीं मिलता! रेल दुर्घटना में पाँच-पाँच लाख!"

"काश! मृतकों और घायलों में हम भी होते!" उस मज़दूर की बातों के समर्थन में जैसे कलवा धीरे से बुदबुदाया हो।

मेरे हाथ से चाय का गिलास छूट गया और मैंने अपने जिस्म पर एक झुरझुरी-सी महसूस की।

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एक अदना-सा अदबी ख़िदमतगार
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