तिरंगा

guru saxena

रचनाकार- guru saxena

विधा- कविता

तिरंगा, सवैया छंद

दे रहे लोग सलामी तुझे यह पाकर पर्व महान तिरंगा
तू बतला रहा मोल आजादी का कैसे हुए बलिदान तिरंगा
देख तुझे जनमानस में जगा जोश जलेश समान तिरंगा
मान तेरा सबसे पहले फिर गाएंगे राष्ट्र का गान तिरंगा

भाग बटा बंटवारे में देश का जिद्द ने ठान ली ठान तिरंगा
धर्म का तर्क धरा तड़फी बना एक नादान महान तिरंगा
चाहता हूं कि हिलोर उठे बने देश पुराने समान तिरंगा
पाक के छोर लो भारत हो फहराये अकेला निशान तिरंगा

नत हो उनका यशगान करें बलिदान दिया इस पर्व प्रसंगा
जब लो नभ चांद सितारे रहें धरती पै रहें यमुना अरु गंगा
मर जायें भले मिट जायें भले भले लेना पड़े यम से हमें पंगा
प्रण है अपना सर्वस्व लुटा न कभी झुकने देंगे झंडा तिरंगा

देखना कोई विदेशी व्यापार का मार ना दे फिर से हथकंडा
ऐसी अहिंसा दिखाना नहीं तुम्हें शत्रु ही मान ले नाजुक अंडा
साँड़कवि कहें भारतवासियों एकता का मजबूत हो फंडा
फंडा किसी का चलेगा नहीं सब झंझट दूर झुकेगा न झंडा

अपने सबके दिल में नितही बहती रहे देश के प्रेम की धारा
हिंदू व मुस्लिम सिख ईसाई सभी का हो आपस में भाईचारा
हर हालत में हम एक रहें जिस भांति रहे नभ में ध्रुव तारा
शुभदायक नायक हो जगका फहरे सदा ऊंचा तिरंगा हमारा।।

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