** यूं ही नहीँ **

भूरचन्द जयपाल

रचनाकार- भूरचन्द जयपाल

विधा- मुक्तक

महक मेरे दिल की बहुत दूर तलक जाती है
यूं ही नहीं तितलियां मेरे इर्द-गिर्द मंडराती है
ढूंढती मुझको है कस्तूरी मृग की भांति और
मदमस्त अपने ही नशे में मजबूर हो

जाती है ।।
👍मधुप बैरागी

सो गयो कई ख्वाब ले कर
खो गये कई ख्वाब पा कर
रह गये ना सोने वाले अब
खो गया चैन नींद खोकर ।।
👍मधुप बैरागी

निखर लूं चाँद तुझसे बेहतर मैं
कर श्रृंगार सोलह होले होले मैं
रीझ जायेगा प्रीतम मेरा मुझ पे
तेरी चांदनी -रूपोज्वल हो लूं मैं ।।
👍मधुप बैरागी
दिल चाहता है आज फिर मेरा
अपनी जां को जां अपनी दे दूं
या फिर अपनी जां से अपनी जां
वापस ले लूं और बेजान कर दूं ।।
👍मधुप बैरागी

मैं अगर मौत का सौदागर बन जाऊं
तो पहले मौत खरीद अपने लिए लाऊं
ना आऊं दुनियां में लौटकर-लौटकर फिर
फिर औरों को चैन की गहरी नींद सुलाऊं।।
👍मधुप बैरागी

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भूरचन्द जयपाल
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मैं भूरचन्द जयपाल सेवानिवृत - प्रधानाचार्य राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, कानासर जिला -बीकानेर (राजस्थान) अपने उपनाम - मधुप बैरागी के नाम से विभिन्न विधाओं में स्वरुचि अनुसार लेखन करता हूं, जैसे - गीत,कविता ,ग़ज़ल,मुक्तक ,भजन,आलेख,स्वच्छन्द या छंदमुक्त रचना आदि में विशेष रूचि, हिंदी, राजस्थानी एवं उर्दू मिश्रित हिन्दी तथा अन्य भाषा के शब्द संयोग से सृजित हिंदी रचनाएं 9928752150

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