तलाश

dr. pratibha prakash

रचनाकार- dr. pratibha prakash

विधा- गज़ल/गीतिका

हाज़िर हूँ अपनी छोटी सी कोशिश के साथ

वक़्त वेवक्त चौक में दौड़ती थी जो शाम
अब हर रोज वही मैं शाम तलाशती हूँ

जो बस् गया मेरे वजूदो ज़हन ज़र्रा ज़र्रा
हर शहर हर गली में वो अक्स तलाशती हूँ

तोड़कर दीवारें मिटटी की बना लिये मकान
इन मकानों में छोटा सा एक घर तलाशती हूँ

तिल गुड़ के लड्डू और संग मूंगफली खाना
वो तिजारत और मोहब्बत तलाशती हूँ

कोई भी नहीं था अपना मोहहले में यकीन था
आज इन अपनों में मैं अपना तलाशती हूँ

मुफलसी में भी नसीब रईस हुआ करते थे
अब दौलत में भी वो सच्ची दौलत तलाशती हूँ

खो सा गया है हिन्दुस्तान दिखावे की होड़ में
अक्सर सोचती प्रतिभा आखिर क्या तलाशती हूँ

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dr. pratibha prakash
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Dr.pratibha d/ sri vedprakash D.o.b.8june 1977,aliganj,etah,u.p. M.A.geo.Socio. Ph.d. geography.पिता से काव्य रूचि विरासत में प्राप्त हुई ,बाद में हिन्दी प्रेम संस्कृति से लगाव समाजिक विकृतियों आधुनिक अंधानुकरण ने साहित्य की और प्रेरित किया ।उस सर्वोच्च शक्ति जसे ईश्वर अल्लाह वाहेगुरु गॉड कहा गया है की कृपा से आध्यात्मिक शिक्षा के प्रशिक्षण केंद्र में प्राप्त ज्ञान सत्य और स्वयं को आपके समक्ष प्रस्तुत कर रही हूँ।

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