“तरबतर”

anupama shrivastava anushri

रचनाकार- anupama shrivastava anushri

विधा- कविता

लबालब भरे ये श्याम घन
चले आये हैं डग बढ़ाये
धरा लहलहाती , खिलखिलाती
है उनके आतिथ्य में सर झुकाये

काले -काले मेघों के ये घेरे हैं ख़ूब घेरे
ज़रा सा हाथ बढ़ाया और बरस पड़े
पावन सी प्रकृति खिल -खिल गयी
रेशमी बूंदों से पहन ताज़गी का पैरहन

ठहर -ठहर गुज़रती हवा आईने से जल पर
करती चली बेतकल्लुफ चित्रकारियां
बारिशों ने भिगोई है जो शाम ओ सहर
तरबतर हो गया है दिल का शहर

Sponsored
Views 54
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
anupama shrivastava anushri
Posts 3
Total Views 1k

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia
2 comments
  1. बहुत बहुत सुंदर पंक्तिया,मन की भावनाओं के अत्यधिक करीब, सचमुच – सरन घई